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चंद्रयान 3 पर खुश होना जरूरी या धर्ती पर शांती स्थापित करना जरूरी?

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  इस समय पूरे देश में चंद्रयान 3 के चांद पर सहीह सलामत उतरने की खुशी हे और हर तरफ खुशी का तांता लगा हुआ है और खासकर हमारी सरकार में दूसरों से ज्यादा हिस्सा लेने का जुनून है।   और मुझे लगता है कि उनमें से कुछ बस एक खास पार्टी की  इसमें कोई शक नहीं है कि यह इसरो वैज्ञानिकों की बे मिसाल मेहनत और उनके अंथक प्रयासों का परिणाम है इस पर उन की जितनी सराहना की जाए कम हे और वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रमा तक पहुंचना किसी भी देश के लिए बहुत गर्व की बात है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के विकास से देश के प्रत्येक नागरिक को दिली खुशी होती हे इसी कारण हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से खुश है और होना भी चाहिए  परन्तु  सवाल यह है की अरबों रुपये खर्च कर चांद तक पहुंच ही विकास का पैमाना है?  मणिपुर में मानवता मर रही है. तीन महीने से ज्यादा समय से हत्या और खून का बाजार गर्म है, कितने ही परिवार बर्बाद हो गए हैं,  देश में बेरोजगारी आम है,   हर साल मॉब लिंचिंग में सैकड़ों लोग मारे जाते हैं,दंगों में हजारों परिवार बर्बाद हो जाते हैं,  हर साल न जाने कितने किसान आत्महत्या ...

इस्लाम में जिना की कबाहत (बुराई)

  केवल इस्लाम को ही यह गौरव प्राप्त है कि उसने शुद्ध समाज के निर्माण और अस्तित्व के लिए जो नियम और कानून निर्धारित किये हैं वे दुर्लभ और ना याब हैं उन्होंने न केवल अपराधों की जघन्यता का वर्णन किया और अपराधों के घटित होने पर कड़ी से कड़ी सजा या सीमा निर्धारित की, बल्कि अपराधों की ओर जाने वाले रास्तों को भी अवरुद्ध किया और पापी स्वभाव और इच्छाओं के प्रेमियों को निषेधों से बचने और नफरत करने की शिक्षा दी।   देखिये, यही तरीका व्यभिचार जिना के साथ भी अपनाया गया। उन्होंने न केवल व्यभिचार से मना किया, बल्कि आसपास घूमने से भी मना किया हदीसों में व्यभिचार जिना की निंदा (1)  जब कोई व्यक्ति व्यभिचार जिना करता है तो ईमान उसका साथ छोड़ देता है और उसके सिर पर छत्र की तरह छा जाता है और जब वह इस कृत्य से अलग हो जाता है तो ईमान उसके पास लौट आता है। *(तिरमिजी शरीफ) 4/283, हदीस: 2634)* (2)  हज़रत अम्र बिन आस रजी अल्लाहु अन्हू से मरवी है कि , पवित्र पैगंबर अलैहिस्सलाम ने कहा: जिस राष्ट्र में व्यभिचार जिना आम हो जाए वह अकाल(कहत) की चपेट में आ जाएगा, *(मिश्कवत उल -मसाबीह, किताब उल-हुदूद, 2...

اسلام میں زنا کی قباحت

آسمان تلے یہ فخر صرف اسلام کو حاصل ہے کہ اس نے پاک معاشرہ کی تشکیل اور بقا کیلئے جو اصول و قوانین مقرر کئے وہ نایاب و نادر ہیں اس نے صرف جرائم کی قباحت بیان کرنے اور وقوع جرم پر  سخت ترین تعزیرات یا حدود ہی کا تعین نہیں کیا بلکہ جرائم تک لےجانے والے راستوں کو مسدود کیا گناہوں کی جانب میلان رکھنے والی طبیعتوں اور خواہشات کے دلدادوں کو ممنوعات سے احتراز و نفرت کرنا سکھایا  زناکے ساتھ بھی یہی تدبیرو طریقہ اختیار کیا گیا  دیکھئے" ولا تقربوا الزنا انہ کان فاحشۃ وساء سبیلا" زنا کے قریب بھی مت جاؤ بے وہ بے حیائی اور برا راستہ ہے. نفس زنا سے ہی منع نہیں کیا بلکہ قریب بھٹکنے سےبھی منع کردیا زنا کی مذمت احادیث میں    جب بندہ زنا کرتا ہے تو اُس سے ایمان نکل کر سر پر سائبان کی طرح ہوجاتا ہے اور جب اس فعل سے جدا ہوتا ہے تو اُس کی طرف ایمان لوٹ آتا ہے۔  *(ترمذی، کتاب الایمان، باب ما جاء لا یزنی الزانی وہو مؤمن، ۴ / ۲۸۳، الحدیث: ۲۶۳۴)*   حضرت عمرو بن عاص رَضِیَ اللہ تَعَالٰی عَنْہُ سے روایت ہے حضور اقدس صَلَّی اللہ تَعَالٰی عَلَیْہِ وَاٰلِہٖ وَسَلَّمَ نے ارشاد...

औरतों के हुकूक और इस्लाम का निराला इन्साफ

  यदि इस्लाम में महिलाओं की स्थिति और एहमियत को समझना हो तो मुहम्मद के आगमन और आविर्भाव के समय विश्व के सभ्य राष्ट्रों के स्त्री के साथ वेहवार & सोच पर नजर डालें! किसी के लिए स्त्री बुरी थी, किसी के लिए स्त्री सामुहिक वस्तू , किसी के लिए वह केवल उपयोग की वस्तु थी, अन्य वस्तुओं की भाँति स्त्री भी बेची जाती थी। इस कारण कि सभी अपमानों का मानक और अपमान का चिन्ह  थी और एक महिला की गरिमा का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। इसके विपरीत, इस्लामी शिक्षाएं देखें। शादी तक, उसका पालन पोषण शिक्षा पिता द्वारा अनिवार्य कर दी गई थी, न केवल अनिवार्य थी, बल्कि लड़की की परवरिश के लिए इनाम और माफी के सर्वोत्तम वादे भी किए गए थे। उदाहरण के लिए,    अनस बिन मलिक से वर्णित है कि अल्लाह के दूत (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा, "जिस व्यक्ति की दो बेटियाँ हैं और जो उन्हें अच्छी तरह से पालता & शिक्षित करता है, वह कयामत के दिन ऐसी स्थिति में आएगा कि वह और मैं इस तरह होंगे" उन्होंने अपनी दोनों उंगलियां जोड़कर अपने और लड़कियों को पालने-पोसने वाले के बीच नजदीकियों की ओर इशारा किया. और इसमें द...

عورتوں کے حقوق اور اسلام کا نرالہ انصاف

اسلام میں عورت کا مقام و مرتبہ سمجھنا ہو تو محمد صلی اللہ علیہ وسلم کی آمد اور ظہور کے وقت دنیاکی مہذب و متمدن قوموں کے عورتوں کے ساتھ رویوں اور برتاؤ کو دیکھو! کسی کے یہاں عورت شر ہی شر تھی کسی کے نزدیک عورت  متاع مشترک تھی کسی کے یہاں بس قابل استعمال چیز تھی دیگر سامانوں کی طرح عورت بھی فروخت کی جاتی تو کہیں رقص و سرود کی محفلوں کو چار چاند لگانیوالی  شہوت کے بھوکے بھیڑیوں کو شکم سیر کرنیوالی غرضیکہ ہر طرح کی ذلت کا معیار اور نشان اہانت تھی اور عزت و مرتبہ کا عورت سے دور کا بھی واسطہ نہ تھا اس کے مقابلہ میں اسلامی تعلیمات  ملاحظہ کریں جوں ہی ننھی گڑیا پیدا ہوتی ہے اس کی پیدائش کو رحمت و برکت قرار دیا گیا اور شادی ہونے تک اس کی تربیت باپ کے ذمہ لازم کردی نہ صرف لازم بلکہ بچی کی تربیت پر بہترین وعدہ ثواب و مغفرت کئے گئے مثلاً  حضرت انس بن مالک سے روایت ہے کہ رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا" جس شخص کے دو بچیاں ہوں اور اس نے ان کی اچھی تربیت و پرورش کی وہ قیامت کےدن اس حال میں آئے گا کہ وہ اورمیں اس طرح ہو نگے" اور اپنی دو انگلیوں کو ملا کر اپنے اور بچیوں کی پرو...